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गीता प्रेस, गोरखपुर >> आशा की नयी किरणें

आशा की नयी किरणें

रामचरण महेन्द्र

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :214
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1019
आईएसबीएन :81-293-0208-x

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प्रस्तुत है आशा की नयी किरणें...

मानव-जीवन कर्मक्षेत्र ही है


कर्मक्षेत्रं हि मानुष्यम्। (व्यास०)

मनुष्यका अधिकांश जीवन परिश्रमका जीवन है। जैसे बिना भोजन तथा वायुके जीवन असम्भव है, बिना श्रमके जीवन नीरस और शिथिल है। प्रत्येक मानव-विशेषणसे विभूषित होनेवाले व्यक्तिमें 'परिश्रम' वह दिव्य गुण है जिसके द्वारा वह संसारमें विकसित होता है; अपने शरीर, मस्तिष्क तथा आत्माके गुणोंकी वृद्धि करता है। परिश्रम हर प्रकार, हर स्थिति तथा वर्गके व्यक्तिके लिये एक आवश्यक तत्त्व है।

जब संसारके सब जीव श्रमद्वारा शक्तिका अर्जन कर रहे हैं, तो आप कैसे निष्क्रिय रह सकते हैं? बिना श्रमके भला क्योंकर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, सम्मान तथा उत्तरदायित्वकी रक्षा कर सकते हैं?

परिश्रम सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। इसके द्वारा हमारा सम्बन्ध अन्य व्यक्तियों तथा वस्तुओंसे होता है। यदि हम जीवनचरित्रोंका अध्ययन करें, तो हमें विदित होगा कि सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति प्रायः कठिन श्रम करनेके अभ्यस्त रहे हैं, अपने आविष्कारोंमें सतत लगनशील और उत्तरदायित्वोंमें वीर और दृढ़ रहे हैं। संसारमें आप जिन कार्योंसे चमत्कृत होते हैं वे मानवके हाथों या मस्तिष्कके श्रमके अद्धृत चमत्कार हैं। उनमें श्रमका सौन्दर्य और स्थायित्व है। श्रम प्रगतिका चिह्न है।

बफून कहा करते थे, 'प्रतिभाशाली व्यक्तियोंकी प्रतिभाका मूल मन्त्र उनके धैर्यमें है।' वे किसी विरोधसे भी पस्तहिम्मत न होते थे, न थकते ही थे। वे प्रत्येक मिनटका उचित उपयोग करते थे। अपेलीज प्रत्येक दिन कुछ-न-कुछ अवश्य लिखते थे। न्यूटन निरन्तर धैर्य और सतर्कतासे प्रकृतिका निरीक्षण किया करते थे। वाट कहा करते थे, 'हमें यह जानना चाहिये कि किस बातसे काम चलेगा, किससे नहीं।' वास्तवमें जो व्यक्ति धैर्यके साथ निरीक्षण करनेकी बुद्धि विकसित कर लेता है, वह अच्छा श्रम कर पाता है। वह सत्यता और सही रूपमें प्रत्येक तथ्यको देखता है। एक बार न्यूटनने कहा था कि 'उन्होंने जिस गुणके विकासमें सबसे अधिक ध्यान दिया था, वह यह था कि वे किसी समस्याको अपने मानव-चक्षुओंके सम्मुख बहुत देरतक रख सकते थे और जीवनके अनुभवोंसे उसकी सत्यता मालूम करते रहते थे, यहाँतक कि उन्हें समस्याका हल प्राप्त हो जाता था।'

आपके कार्यमें अनेक विघ्न-बाधाएँ प्रतिरोध एवं प्रतिकूलताएँ पड़ेगी, लेकिन ये कठिनाइयाँ वास्तवमें आपकी सहायक शक्तियाँ है, जो पग-पगपर आपकी शक्तियोंकी परीक्षा करती हैं और आपको दृढ़तर बनाती हैं। वे आपको अनुभव देती हैं और अध्यवसायी बनाती हैं।

हरकूलीज नामक यूनानी वीरका सिर शेरकी खालसे ढका होता था और शेरके पंजे उसके गलेके नीचे चुभते रहते थे, जिसका तात्पर्य यह था कि जब कठिनाइयोंपर विजय प्राप्त हो जाती है, तो वे हमारी सहायक शक्तियाँ बन जाती हैं।

घटनाएँ परिस्थितियोंसे सम्बन्धित रहती हैं। उनका फल हमारे चरित्रपर निर्भर रहता है। आप किसी घटनाके प्रति वैसी प्रतिक्रिया दिखाते हैं, यही कसौटी है। एक प्रतिभाशाली व्यक्तिके लिये असफलता सफलताका सोपान हो सकता है, जब कि एक कमजोर व्यक्तिके लिये वही एक ऐसा खन्दक बन सकता है, जिसमेंसे निकलना असम्भव हो। सब कुछ हमारी इच्छाशक्ति और संकल्पपर निर्भर है। जहाँ चाह है वहाँ राह अवश्य निकल आती है।

जिस वस्तु या जिन-जिन वस्तुओंको आप मूल्यवान् समझते हैं, उसका मूल्य श्रम ही है। श्रमके बिना उसकी प्राप्ति असम्भव थी। महान् पुरुषोंकी सफलताका गुर निरन्तर अनवरत श्रम है। उन्होंने जो कार्य हाथमें पकड़ा, वे लगातार उसीको

आगे लेकर बढ़ते रहे है। हम यह मानते हैं कि उनमें जन्मजात प्रतिभा, बुद्धि तीव्रता रही होगी, किंतु उनमें जिस गुणका आधिक्य था, वह परिश्रम था। श्रमको सजा मत मानिये, प्रत्युत आशा और उत्साहका सम्मिश्रण कीजिये।

सेन्ट अगस्टाइन कहा करते थे, 'आलस्यमें बिना कुछ किये निष्क्रिय पड़े रहना सबसे कठिन कार्य है। वह व्यक्ति धन्य है जो अपना जीवन और शक्तियाँ उत्तम कार्योंकी सिद्धिमें लगाता है और अपनी योजनाएँ पर्याप्त सोच-समझकर निर्मित करता है। न केवल बड़ी योजनाओंमें, छोटी तथा मामूली योजनाओं तक में, श्रमकी अतीव आवश्यकता पड़ती है। आलस्यमें सम्पत्ति अर्जित करनेमें लगे हुए समयसे आधे समयमें ही नष्ट हो जाती है।'

एक संस्कृत कहावतका सार है-'लक्ष्मी उस नर-शिरोमणिके साथ रहती है; जो सर्वाधिक श्रम करता है। वे व्यक्ति दुर्बल है, जो भाग्यको ही निर्माण करनेवाली शक्ति माने बैठे है।'

इस देशके नवयुवकोंका सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है। बेकारोंकी संख्या बढ़ानेवाले कुछ व्यक्ति तो वास्तवमें काम न मिलनेसे परेशान है, किंतु अधिकांशमें उनमें ऐसी संख्यावाले अधिक हैं, जो आलसी, बेकार, निठल्ले और मुफ्तमें सब कुछ चाहनेवाले हैं। जो पेशे अधिक परिश्रम चाहते हैं, उनमें वे दिलचस्पी नहीं लेते। उन नौकरियोंकी ओर दौड़ते हैं जिनमें कम मेहनत करनी पड़ती है। काम न करके, वे आलस्यमें अपनी शक्तियोंका और भी क्षय कर रहे हैं। जिन शक्तियोंका उपयोग नहीं किया जाता, वे अन्ततः नष्ट हो जाती हैं। शारीरिक और मानसिक शक्तियोंके प्रति आलस्य-भावना अनर्थकारी है। आलस्यने उन्हें पतित और कमजोर बना दिया है। कुछ दिन तो मनुष्यको आलस्यमें कुछ आकर्षण प्रतीत होता है; किंतु बादमें खाली बैठे ठाले रहना भी दुःसह हो जाता है। आलस्यमें आनन्द मनाने, प्रसन्न रहनेकी शक्ति मारी जाती है। जिस व्यक्तिके जीवनमें सदा छुट्टी ही रहती हो, वह छुट्टीके आनन्दको क्या समझ सकता है। बिस्तरपर पड़े रहनेवालोंने कब क्या किया है? उन्हें अपने सोनेसे ही कब फुरसत मिली है? बड़े-बड़े अवसर निकले चले जाते हैं और वे सोये पड़े रहते हैं। जिसे हम आलस्य कहते हैं, वह हमारी शक्तियोंके पंगु होनेकी एक  निशानी है।

आलस्य जीवित व्यक्तिकी समाधिकी तरह है। आलसी व्यक्ति न अपनी उन्नति, सेवा या प्रगति कर सकता है, न समाज, देश अथवा परमेश्वरके ही काम आ सकता है। वह तो चूहे, खटमल या मक्खी-मच्छरोंकी तरह व्यर्थ ही इस सृष्टिके अन्नको नष्ट करता है। जब उसके मरनेका समय आता है, तो वह व्यर्थ जीवन कीट-पतंगों या पशु-पक्षियोंकी तरह नष्ट हो जाता है। ऐसे लोग जो कुछ करते हैं वह बंजर भूमिकी तरह व्यर्थ है। आलस्य समयकी बरबादी है।

पुराने यूनानी लोग कार्यको एक सामाजिक आवश्यकता समझते थे। सोलन कहते हैं कि 'जो व्यक्ति काम नहीं करता था अथवा उससे जी चुराता था, वह कोर्टके सुपुर्द कर दिया जाता था।' एक दूसरे यूनानी वेत्ताका कथन है कि 'जो व्यक्ति कामसे जी चुराता है, वह चोर-डाकू है।' श्रम करनेवाले व्यक्ति अपराधी नहीं होते। उनकी वृत्तियाँ शुभ कार्योंमें लगती हैं। वे ऊँचाईकी ओर चढ़ते हैं। आलसी व्यक्तिका दिमाग झगड़ोंकी जड़ है। उसमें रह-रहकर शरारत और खुराफातें उठा करती हैं। खाली बेकार बैठकर हम प्रमाद-पापकी ओर प्रवृत्त होते हैं। जो व्यक्ति अपनेको कार्यसे मुक्त समझता है वह दयाका पात्र है, साथ ही सजाका हकदार है। यदि आप अशिक्षित हैं तो थोड़ेसे श्रमसे शिक्षित बन सकते हैं, यदि पिछड़े हुए हैं तो मेहनतसे भागकर आगे निकल सकते हैं, यदि दुर्बल हैं तो सशक्त और साहसी हृष्ट-पुष्ट बन सकते हैं, अपनी सब निर्बलताओंको दूर भगा सकते हैं और प्रतिष्टाका जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

प्रलोभन आलस्यकी शक्लमें आता है और हमें कर्ममार्गसे च्युत करता है। 'तनिक विश्राम कर लें'-ऐसा विचार मनमें आते ही, वह अपनी शक्तियोंको समेट लेता है। इस 'तनिक' से उसकी शक्तियोंको पूरा काम नहीं मिल पाता। फलतः वह अपनी सृजनात्मक शक्तियाँ खो बैठता है।

अरस्तूने कहा है-'आनन्द एक शक्ति है। दैनिक पर्यवेक्षणसे आपको विदित होगा कि आनन्द और स्वास्थ्यकी आलस्यसे पुरानी शत्रुता है। अनेक व्यक्तियोंके जीवनमें असंख्य अवसर आते हैं, उनकी प्रसन्नताकी प्राप्तिके बहुत-से साधन हो सकते हैं। समयका सदुपयोग कर ये व्यक्ति कहींके कहीं पहुँच सकते है। फालतू वक्तमें अपनी गुप्त शक्तियोंको बढ़ाकर ये अपने-आपका आमूल परिवर्तन कर सकते हैं और इन्हीं आलसियोमें ऐसे अनेक व्यक्ति निकल सकते हैं जो शानदार फल प्राप्त कर सकते हैं, पर शोक! ये अपनी मोह-निद्रामें सोये पड़े रहते हैं। इन सदाके लिये

अपने हाथसे भागते हुए मिनटों, घंटों, दिनों और सप्ताहोंको मजबूतीसे नहीं पकडते। इन्हें व्यर्थ मत क्षय होने दीजिये वरं अपने कार्यसे स्थायी बनाइये।'

यौवनका समय स्वर्णयुग है। जीवनके ये बहुमूल्य क्षण मनुष्यको किसी विशेष दिशामें मोड़नेके लिये समर्थ हैं। उस समय शक्तियाँ अपने पूरे उभारपर रहती हैं उनसे खूब परिश्रम लिया जा सकता है। प्रौढ़ हो जानेपर ये शक्तियों चाँदीकी तरह है। चाँदीके जिस प्रकार अनेक उच्च उपयोग हो सकते हैं उसी प्रकार प्रौढ़ जीवनके समयसे भी प्रचुर लाभ उठाया जा सकता है। वृद्धावस्थाका युग शीशेकी तरह है, जिसके उपयोग हैं पर बड़े नहीं। फिर भी अपनी शक्ति और सामर्थ्यके अनुसार उसका भी कुछ-न-कुछ उपयोग हो ही सकता है।

यदि कार्य करें, लेकिन देरसे झिकाकर दुःख देकर करें, तो क्या लाभ? कार्य तो वही उत्तम है, जो उचित समयपर समयानुकूल ही कर दिया जाय-जब समय निकल गया, तो उसे करनेसे न लाभ हो सकता है न प्रशंसा ही प्राप्त हो सकती है। नियमपूर्वक ठीक समयपर कार्य पूर्ण कर देना परमेश्वरका एक आशीर्वाद है। टालने या देरसे करनेके कारण अनेक बड़े व्यक्तियोंका पतन हुआ है।

कुछ व्यक्तियोंके असफल होनेका कारण क्रम तथा व्यवस्थाकी कमी है। वे काम खूब करते हैं किंतु सब अव्यवस्थित, टूटा-फूटा, बेतरतीब, विश्रृंखल। जबतक ठीक योजना न बनायी जाय और अपने कार्यको क्रमानुसार पूर्ण न किया जाय, तबतक स्थायी लाभ प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत कार्य अधूरा-सा ही रह जाता है।

क्रम तथा सुव्यवस्था सर्वत्र लाभदायक हैं। घर हो या आफिस, दूकान या और से कोई अस्पताल, सुव्यवस्था अमित फल देनेवाली है। व्यवस्थित व्यक्ति थोड़ेसे श्रमसे बहुत काम निकाल सकता है, थोड़ी वस्तुओंसे बहुत-सा लाभ प्राप्त कर सकता है तथा रुपया भी बचा सकता है। आपके घर, दूकान या आफिसकी प्रत्येक, वस्तुका एक नियत स्थान होना चाहिये। प्रत्येक सदस्य वस्तुको उसी नियत स्थानपर रखे, इधर-उधर न फैलाये। जो वस्तु जहाँसे उठायी जाय वहीं रखी जाय, जो पुस्तक अलमारीके जिस स्थानपर रखी है, वहीं रखी जाय। घरमें आपका चाकू, दियासलाई, लिखने-पढ़नेकी वस्तुएँ कपड़े, कुर्सी मेज, कंघा, शीशा इत्यादिका, जो स्थान नियत हो चुका है वहीं पहुँचना चाहिये। लिखने-पढ़ने, हिसाब-किताब,

ऋण या मिलने-जुलनेमें भी समय और क्रमका ध्यान रखें। पहले सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हाथमें लें, फिर कम महत्त्वपूर्ण, फिर अन्य साधारण काम। प्रायः लोग मामूली कामोंको पहले हाथमें ले लेते हैं, जबकि महत्त्वपूर्ण कार्य यों ही पड़े रह जाते हैं।

काममें समयकी पाबंदीका सतर्कतासे ध्यान रखें। बिना समयकी पाबंदीके मनुष्य चिन्तित रहता है तथा कामको पर्वतकी तरह भारी और दुरूह कष्टसाध्य मानता है। नियत समयपर कार्य करनेका गुण सर्वत्र प्रशंसित होता है। ऐसे व्यक्तिपर सब विश्वास करते हैं और जिम्मेदारीके कार्य प्रदान करते हैं।

जीवन एक प्रगति है। यह उन्नति और श्रेष्ठताकी ओर बढ़ना है। हम आशामय प्रयत्नोंसे निरन्तर आगे बढ़ते चलते हैं। प्रायः कठिनाई सत्य-प्राप्तिमें एक गुरुका कार्य करती है। विरोध हमारी गुप्त शक्तियोंको जाग्रत् करता और आगे बढ़नेकी प्रेरणा प्रदान करता है। अधिक कठिनाइयाँ पड़नेपर हमारा आत्म-विश्वास बढ़ता है, विनम्रता आती है और सहिष्णुताकी शक्तियाँ बढ़ जाती हैं।

आपका जीवन बंद पानीकी तरह एक स्थानपर बँधा हुआ सड़ता-गलता नहीं होना चाहिये। यदि आप उसे आगे नहीं बढ़ायेंगे, जीवनमें प्रवाह नहीं लायेंगे, तो वह पीछे (पतन, आलस्य और मृत्यु) की ओर चलने लगेगा। जहाँ आपको कठिनाइयाँ मिलें, उनकी परवा न करते हुए आपको आगे बढ़ जाना चाहिये। सर फिलिप सिडनीका मूल मन्त्र हमें प्रेरणा देनेवाला है-'मैं सफलता और कार्यसिद्धिका मार्ग मालूम कर लूँगा। यदि न मिला, तो स्वयं निर्माण कर लूँगा।' यदि आपको अपना मार्ग नहीं मिलता, तो अपनी मौलिकता, बुद्धि तथा अध्यवसायसे उसे मालूम क्यों नहीं कर लेते?

आराम तथा विलासमें रहनेसे मनुष्य जीवनभर बचा ही बना रहता है। कठिनाइयों और विरोधोंमें रहनेसे उसमें पुरुषोचित शक्ति और सामर्थ्यकी वृद्धि होती है।

बड़े बननेवाले व्यक्तियोंके जीवनका अध्ययन करनेसे विदित होता है कि उनमें कुछ अपूर्णताएँ त्रुटियाँ या प्रकृतिकी ओरसे कुछ कमजोरियाँ थीं। इन कमजोरियोंको दूर करनेकी प्रतिक्रियाने उन्हें ऊँचा उठाकर आसमान तक चढ़ाया था। चरित्रकी दृढ़ता या कमजोरीकी सच्ची परीक्षा तभी होती है, जब बाह्य परिस्थितियोंमें कोई असाधारण परिवर्तन होता है या कोई विरोध उत्पन्न होता है।

विरोधसे मनुष्यको अपनी सब शक्तियोंके सामूहिक बलपर अपनी प्रतिष्ठाकी रक्षा करनी होती है। अनेक छिपी हुई गुप्त शक्तियोंका विकास होता है। कठिनता एक भारी हल है। उसे चलानेके लिये लोहेसे सख्त हाथोंकी आवश्यकता है।

आपका श्रम चाहे शारीरिक हो अथवा मानसिक, आपको चाहिये कि आप पूरी शक्ति और एकाग्रतासे उसमें संलग्न हो जायँ, तन्मयतापूर्वक उसे सम्पन्न करते रहें और जबतक उसे पूरा न कर डालें कदापि न छोड़े। अपने पसीनेकी आयसे आपको समुन्नत होना चाहिये।

धनकी त्रुटियाँ बताते हुए प्रायः कहा जाता है कि इससे हमारी नैतिकताको धक्का लगता है; सहानुभूति, दया, करुणाका लोप होने लगता है, लेकिन गरीबी इससे भी बुरी है, निन्द्य है। गरीबीसे मनुष्यका साहस और उत्साह मारा जाता है, सच्चा और प्रतिष्ठित होना कठिन हो जाता है। अतः श्रमद्वारा अपनी गरीबीको दूर करनेका प्रयत्न करना चाहिये।

श्रमके साथ विश्राम और निर्दोष मनोरंजनका भी उचित सम्मिश्रण होना अपेक्षित है। आप परिश्रम करें और थकनेपर पर्याप्त विश्राम करें, मनोरञ्जनद्वारा मनका भार दूर करें, जिससे नया उत्साह और शक्ति प्राप्त हो सके।

अपने कार्यमें निरन्तर संलग्न रहना, मन उचाट न कर उसमें समृद्धिशील बननेका प्रयत्न करते रहना मनुष्यके लिये सबसे स्वस्थ शिक्षा है। जो अपनी शक्तियोंका सुचारु उपयोग श्रममें करता चलता है, वह कठिन कार्योंमें भी सफलता प्राप्त करता जाता है। समृद्धि उसके साथ चलती है।

श्रमशील व्यक्ति तड़के उठता है और अपने कामपर यथासमय जाता है। वह एक सेकंड भी व्यर्थ नष्ट नहीं करता। वह सतर्क और जागरूक बना रहता है अवसरोंको व्यर्थ नहीं जाने देता। आपने पर्याप्त समझ-बूझकर अपना जो भी कार्यक्रम उद्देश्य या मूल काम निश्चित किया हो, उसमें दृढ़तासे लग जाइये, अपने निश्चयोंके प्रति सच्चे रहिये। ध्यान रखिये कि आलस्य, तन्द्रा, विलास या बीमारीकी केंचुली आपके इर्दगिर्द चिपटी न रह जाय।

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    अनुक्रम

  1. अपने-आपको हीन समझना एक भयंकर भूल
  2. दुर्बलता एक पाप है
  3. आप और आपका संसार
  4. अपने वास्तविक स्वरूपको समझिये
  5. तुम अकेले हो, पर शक्तिहीन नहीं!
  6. कथनी और करनी?
  7. शक्तिका हास क्यों होता है?
  8. उन्नतिमें बाधक कौन?
  9. अभावोंकी अद्भुत प्रतिक्रिया
  10. इसका क्या कारण है?
  11. अभावोंको चुनौती दीजिये
  12. आपके अभाव और अधूरापन
  13. आपकी संचित शक्तियां
  14. शक्तियोंका दुरुपयोग मत कीजिये
  15. महानताके बीज
  16. पुरुषार्थ कीजिये !
  17. आलस्य न करना ही अमृत पद है
  18. विषम परिस्थितियोंमें भी आगे बढ़िये
  19. प्रतिकूलतासे घबराइये नहीं !
  20. दूसरों का सहारा एक मृगतृष्णा
  21. क्या आत्मबलकी वृद्धि सम्मव है?
  22. मनकी दुर्बलता-कारण और निवारण
  23. गुप्त शक्तियोंको विकसित करनेके साधन
  24. हमें क्या इष्ट है ?
  25. बुद्धिका यथार्थ स्वरूप
  26. चित्तकी शाखा-प्रशाखाएँ
  27. पतञ्जलिके अनुसार चित्तवृत्तियाँ
  28. स्वाध्यायमें सहायक हमारी ग्राहक-शक्ति
  29. आपकी अद्भुत स्मरणशक्ति
  30. लक्ष्मीजी आती हैं
  31. लक्ष्मीजी कहां रहती हैं
  32. इन्द्रकृतं श्रीमहालक्ष्मष्टकं स्तोत्रम्
  33. लक्ष्मीजी कहां नहीं रहतीं
  34. लक्ष्मी के दुरुपयोग में दोष
  35. समृद्धि के पथपर
  36. आर्थिक सफलता के मानसिक संकेत
  37. 'किंतु' और 'परंतु'
  38. हिचकिचाहट
  39. निर्णय-शक्तिकी वृद्धिके उपाय
  40. आपके वशकी बात
  41. जीवन-पराग
  42. मध्य मार्ग ही श्रेष्ठतम
  43. सौन्दर्यकी शक्ति प्राप्त करें
  44. जीवनमें सौन्दर्यको प्रविष्ट कीजिये
  45. सफाई, सुव्यवस्था और सौन्दर्य
  46. आत्मग्लानि और उसे दूर करनेके उपाय
  47. जीवनकी कला
  48. जीवनमें रस लें
  49. बन्धनोंसे मुक्त समझें
  50. आवश्यक-अनावश्यकका भेद करना सीखें
  51. समृद्धि अथवा निर्धनताका मूल केन्द्र-हमारी आदतें!
  52. स्वभाव कैसे बदले?
  53. शक्तियोंको खोलनेका मार्ग
  54. बहम, शंका, संदेह
  55. संशय करनेवालेको सुख प्राप्त नहीं हो सकता
  56. मानव-जीवन कर्मक्षेत्र ही है
  57. सक्रिय जीवन व्यतीत कीजिये
  58. अक्षय यौवनका आनन्द लीजिये
  59. चलते रहो !
  60. व्यस्त रहा कीजिये
  61. छोटी-छोटी बातोंके लिये चिन्तित न रहें
  62. कल्पित भय व्यर्थ हैं
  63. अनिवारणीयसे संतुष्ट रहनेका प्रयत्न कीजिये
  64. मानसिक संतुलन धारण कीजिये
  65. दुर्भावना तथा सद्धावना
  66. मानसिक द्वन्द्वोंसे मुक्त रहिये
  67. प्रतिस्पर्धाकी भावनासे हानि
  68. जीवन की भूलें
  69. अपने-आपका स्वामी बनकर रहिये !
  70. ईश्वरीय शक्तिकी जड़ आपके अंदर है
  71. शक्तियोंका निरन्तर उपयोग कीजिये
  72. ग्रहण-शक्ति बढ़ाते चलिये
  73. शक्ति, सामर्थ्य और सफलता
  74. अमूल्य वचन

विनामूल्य पूर्वावलोकन

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